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CLASSICAL POETIC TREASURY

अक्षर 'न' से शुरू होने वाले दोहे

4 प्रामाणिक दोहे उपलब्ध हैं।

🪔संत कबीरदास💡नीति एवं सदाचार🎓 Class 9-10

निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

बिनु पानी, साबुन बिना, निरमल करे सुभाय॥

Nindak niyare rakhiye, aangan kuti chhavay. / Binu paani, saabun bina, nirmal kare subhay.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी आलोचना और निंदा करने वाले व्यक्ति को सदैव अपने समीप रखना चाहिए, हो सके तो उसे अपने आँगन में कुटिया बनाकर रख लेना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि वह हमारी कमियों को उजागर करके बिना पानी और साबुन के ही हमारे स्वभाव और चरित्र को निर्मल व दोषरहित बना देता है। स्वस्थ आलोचना आत्म-सुधार का वरदान है।

English: Keep your critic close beside you, even build him a cottage in your own courtyard. For by incessantly pointing out your shortcomings, he purifies your character and temperament without the need for soap and water.

निंदक नियरे राखिए • आलोचना का महत्वपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🪔संत कबीरदास🪔भक्ति एवं आध्यात्म🎓 Class 11-12

नैना अंतरि आव तूँ, ज्यों हौं नैन झँपेउँ।

ना हौं देखूँ और कूँ, ना तुझ देखन देऊँ॥

Naina antari aav toon, jyon haun nain jhanpeun. / Na haun dekhoon aur koon, na tujh dekhan de-oon.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

कबीरदास जी जीवात्मा का परमात्मा के प्रति अनन्य, गोपनीय और प्रगाढ़ प्रेम व्यक्त करते हुए कहते हैं कि हे मेरे प्रियतम प्रभु! तुम मेरे नेत्रों के भीतर समा जाओ, और जैसे ही तुम प्रवेश करो, मैं अपनी पलकें मूँद लूँ। इसके पश्चात् न तो मैं इस संसार में किसी अन्य को देखूँ और न ही तुम्हें किसी और को देखने दूँ। यह माधुर्य भाव की अनन्य पराकाष्ठा है।

English: Step inside my eyes, beloved Lord, and the instant You enter, I shall close my eyelids shut. Thereafter, neither will I gaze upon anyone else in this world, nor shall I let anyone else behold You. Such is the supreme intimacy of divine love.

नैना अंतरि आव तूँ • अनन्य प्रेमपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🌸गोस्वामी तुलसीदास⚖️सत्य एवं धर्म🎓 Class 9-10

निरमल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥

भेद भाउ नहिं जेहि घट होई। मोर परम प्रिय सेवक सोई॥

Nirmal man jan so mohi paawa. Mohi kapat chhal chhidra na bhaawa. / Bhed bhaau nahin jehi ghat hoi. Mor param priya sewak soi.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

श्री राम जी विभीषण से कहते हैं कि जिसका मन निर्मल, शुद्ध और निष्कपट होता है, वही जीव मुझे प्राप्त कर सकता है; मुझे कपट, छल-प्रपंच और दुर्भाव तनिक भी प्रिय नहीं हैं। जिसके अंतःकरण में ऊँच-नीच और छल का कोई भेदभाव नहीं होता, वही मेरा सबसे प्रिय अनन्य भक्त होता है।

English: Lord Rama declares to Vibhishana: "He whose heart is spotless, pure, and devoid of pretense attains Me; deceit, hypocrisy, and malice never find favor with Me." The seeker whose inner consciousness is free from duplicity and divisiveness is My dearest devotee.

निरमल मन जन सो मोहि पावा • निष्कपट भक्तिपूरी व्याख्या व संदर्भ→
🏹महाकवि बिहारीलाल🎓 Class 10

नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहिं काल।

अली कली ही सौं बँध्यौ, आगे कौन हवाल॥

Nahin paraag nahin madhur madhu, nahin vikaasu ihin kaal. / Ali kali hi saun bandhyau, aage kaun hawaal.

Meaning & Commentary (भावार्थ एवं व्याख्या):

बिहारी ने आमेर के राजा जयसिंह को भोग-विलास से जगाकर राजधर्म की ओर प्रेरित करने के लिए यह अन्योक्ति दोहा रचा था। हे भौंरे (राजा)! इस कली में अभी न पराग है, न मधुर मकरंद, और न ही यह पूर्ण विकसित हुई है। यदि तू अभी से कली पर ही मोहित होकर बँध गया है, तो जब यह फूल बनेगी तब तेरी क्या दशा होगी? यह कर्तव्यबोध का प्रेरक दोहा है।

English: Addressed allegory to King Jai Singh to awaken him to statecraft: "There is neither pollen nor sweet nectar in this bud yet, nor has it blossomed. If the bee is already captivated by a tender unblown bud, what fate awaits the kingdom when it blooms into full flower?"

नहिं पराग नहिं मधुर मधु • अन्योक्ति अलंकारपूरी व्याख्या व संदर्भ→